Jitendra Dhebariya
भारतीय समाज में “गाँव” केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें जाति, वर्ग, जेंडर, श्रम और सत्ता के जटिल संबंध अंतर्निहित हैं। हिंदी सिनेमा—विशेषकर लोकप्रिय सिनेमा—इस संरचना को केवल प्रतिबिंबित नहीं करता, बल्कि उसका पुनर्निर्माण करता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से सिनेमा को एक “सामाजिक पाठ” (social text) के रूप में देखा जाता है, जिसमें दृश्य, संवाद और कथानक सामाजिक यथार्थ को विशिष्ट वैचारिक फ्रेम में प्रस्तुत करते हैं (Denzin, 1995; Williams, 1977)।
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में हिंदी सिनेमा में ग्रामीण भारत की छवि नैतिकता, परंपरा और राष्ट्रनिर्माण से जुड़ी रही। किंतु 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण, शहरीकरण और मीडिया-बाज़ार के विस्तार के साथ ग्रामीण जीवन मुख्यधारा सिनेमा से धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया (Jodhka, 2012)। जब गाँव परदे पर लौटा भी, तो अक्सर वह या तो रोमांटिक स्मृति के रूप में था, या फिर संकट और तमाशे के रूप में।
इसी संदर्भ में 2010 में आई फिल्म "पीपली लाइव" विशेष महत्व रखती है। यह फिल्म न केवल किसान आत्महत्या जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस प्रकार मीडिया, राजनीति और राज्य ग्रामीण संकट को एक तमाशे में बदल देते हैं। यह लेख "पीपली लाइव" को एक केस-स्टडी के रूप में लेते हुए यह विश्लेषण करता है कि हिंदी सिनेमा में ग्रामीण जीवन और संकट का प्रतिनिधित्व किस प्रकार किया जाता है, और उसमें कौन-सी संरचनात्मक वास्तविकताएँ दिखाई जाती हैं तथा कौन-सी अदृश्य रह जाती हैं। इस प्रकार "पीपली लाइव" को एक समाजशास्त्रीय पाठ के रूप में पढ़ना, ग्रामीण भारत के प्रतिनिधित्व की राजनीति को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम प्रदान करता है।
ग्रामीण भारत, "पीपली लाइव", हिंदी सिनेमा, किसान आत्महत्या, मीडिया तमाशा, प्रतिनिधित्व, लोकप्रिय संस्कृति
VOL.18, ISSUE No.1, March 2026