Towards Excellence

(ISSN No. 0974-035X)
(An indexed refereed & peer-reviewed journal of higher education)
UGC-MALAVIYA MISSION TEACHER TRAINING CENTRE GUJARAT UNIVERSITY

नाटक के माध्यम से शिक्षाप्रचार: सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक चेतना

Authors:

Preeti Maiyani

Abstract:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति दो हज़ार बीस भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अनुभवात्मक, समावेशी, कौशल-आधारित तथा आजीवन अधिगम की दिशा में पुनर्संरचित करने पर विशेष बल देती है। नीति का केन्द्रीय उद्देश्य शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन की औपचारिक प्रक्रिया न मानकर सहभागिता, अनुभव, चिंतन और आत्म-अनुभव के माध्यम से व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का सशक्त साधन बनाना है। इस नीति-दृष्टि में अधिगम को जीवन से जोड़ने तथा शिक्षार्थी को सक्रिय सह-निर्माता के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना निहित है। इसी परिप्रेक्ष्य में नाटक एक ऐसा प्रभावी और बहुआयामी शैक्षिक माध्यम बनकर उभरता है, जो भाव, अभिनय, संवाद, हाव-भाव और दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को कक्षा की सीमाओं से बाहर ले जाकर जीवन के वास्तविक अनुभवों से जोड़ता है और सीखने को अधिक अर्थपूर्ण, जीवंत तथा सहभागी बनाता है। नाटक-आधारित शिक्षण अनुभवात्मक अधिगम को प्रोत्साहित करता है, जिसमें शिक्षार्थी केवल जानकारी ग्रहण नहीं करते, बल्कि सक्रिय सहभागिता के माध्यम से ज्ञान का निर्माण करते हैं तथा विचार, संवेदना और क्रिया के स्तर पर सीखने की प्रक्रिया में संलग्न होते हैं। इसके माध्यम से संप्रेषण, सहयोग, समस्या-समाधान, सृजनशीलता और आलोचनात्मक चिंतन जैसे वास्तविक जीवन कौशलों का स्वाभाविक विकास होता है। साथ ही, नाटक समावेशी शिक्षा की अवधारणा को सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह विविध भाषायी पृष्ठभूमि, भिन्न क्षमताओं और सामाजिक अनुभवों वाले शिक्षार्थियों को समान अवसर प्रदान करता है और शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाता है। सामाजिक विषयों, मानवीय संबंधों और जीवन स्थितियों की प्रस्तुति के माध्यम से नाटक शिक्षार्थियों में सामाजिक चेतना, सहानुभूति, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करता है, जबकि भारतीय परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों के सजीव चित्रण से उनकी सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ होती है। इसके अतिरिक्त, नाटक शिक्षा को केवल अकादमिक उपलब्धि तक सीमित न रखकर आजीवन अधिगम की भावना को पोषित करता है, क्योंकि इसके माध्यम से अर्जित कौशल और अनुभव शिक्षार्थियों के व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में निरंतर उपयोगी सिद्ध होते हैं। इस प्रकार अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि नाटक राष्ट्रीय शिक्षा नीति दो हज़ार बीस की भावना के अनुरूप शिक्षा को समग्र, मानवीय, समावेशी और समाजोपयोगी बनाने का एक अत्यंत प्रभावी शैक्षिक माध्यम सिद्ध हो सकता है।Top of Form

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Keywords:

नाटक-आधारित शिक्षण, अनुभवात्मक अधिगम, समावेशी शिक्षा, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान, कौशल विकास एवं आजीवन अधिगम

Vol & Issue:

VOL.17, ISSUE No.4, December 2025