Debashis Ghosh
भीमा भोई उन्नीसवीं सदी शताब्दी के दर्शन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। वे पुनर्जागरण काल के समाज सुधारक और रहस्यवादी कवि थे। वे महिमा धर्म से प्रभावित थे। उस समय उन्होंने जाति व्यवस्था और अन्य राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों का भी विरोध किया था। इस लेख का महत्व भीमा भोई के दर्शन पर प्रकाश डालना है। इसमें समाज के उच्च वर्ग द्वारा निम्न जाति के लोगों पर किए जाने वाले अत्याचारों और भीमा भोई द्वारा उन पहलुओं को उजागर करने के तरीके पर चर्चा की गई है। महिमा धर्म और बौद्ध दर्शन के लंबे इतिहास का संक्षिप्त विवरण भी इस लेख में दिया गया है। साथ ही, उनकी कविताओं और पुस्तकों के कुछ प्रमुख दार्शनिक विचारों पर भी चर्चा की गई है। साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले भीमा भोई की कविताओं में सामाजिक सुधार, सादगी और भक्ति भाव समाहित थे, यही कारण है कि वे जनमानस में लोकप्रिय हुईं। यह लेख उनकी कविताओं की उन विशेषताओं का भी विश्लेषण करता है जिन्होंने उनकी लोकप्रियता में योगदान दिया। वे एक महान दार्शनिक थे। उन्होंने हमें 'पिंड-ब्रह्मांड तत्व' का ज्ञान दिया, जो केवल भारतीय मध्यकालीन भक्ति साहित्य में ही मिलता था। उनके शब्द और समाज के प्रति उनकी भक्ति अत्यंत सुंदर है। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा सत्य और न्याय के मार्ग का अनुसरण किया। उनका प्रसिद्ध कथन है, "मो जीवन पच्छे नरके पदितौ जगत उद्धार हेउ", जिसका अर्थ है कि मेरी आत्मा नरक में जाए, परन्तु संसार मुक्त हो।
भीम भोई, महिमा धर्म, अलेखा, शून्यवाद, मानवतावाद, मुक्ति
VOL.17, ISSUE No.4, December 2025